CHITRAGUPTA SAMITI  

Asi Darbhanga

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Karn Kayastha Chitraguptasamiti Parivar Asi

Posted by chitraguptasamitiasi on December 4, 2013 at 2:55 PM Comments comments (0)

Below are the lists of participator, mentor and active members at Chitragupta Puja 2013

  • 1.Kulanand Lal Das
  • 2.Digambar Lal Das- Mob: 9901132705
  • 3.Baleshwar Lal Das- Mob: 9771803367
  • 4.Rajnandan Lal Das- Mob: 9570454678
  • 5.Uday Chandra Lal Das- Mob:9471565462
  • 6.Jitendra Lal Das- Mob:8051958785
  • 7.Ganeswar Lal Das
  • 8.Shobhakant Lal Das- Mob:9955729148
  • 9.Anil Kumar Das- Mob: 9534682996
  • 10.Tarni Prasad Mallik- Mob: 9472232215
  • 11.Ashok Kumar Das- Mob: 9473149561
  • 12.Bibhuti Chandra Das
  • 13.Lalit Kumar Das
  • 14.Loknath Mallik- Mob: 9801138360
  • 15.Gunjan Kumar Mallik- Mob: 9801127805
  • 16.Sanju- Mob: 9931714452
  • 17.Ajit Kumar Das, s/o Ravindra Lal Das- Mob: 7631346593
  • 18.Kishor Lal Das- Mob:8294563507
  • 19.Kaushal Kishor Lal Das (Baiju)- Mob: 9939726901/9866685212
  • 20.Raghvendra Kumar (Pinku)- Mob: 9939440275
  • 21.Sunil Kumar Karn- Mob: 9430309495
  • 22.Manil Kumar Karn- Mob: 9430154023
  • 23.Tinku Kumar- Mob: 9826580375
  • 24.Shashi Bhushan Lal Das- Mob: 9431653272
  • 25.Raman Kumar Das- Mob: 7677113610
  • 26.Sudhir Kumar- [email protected]
  • 27.Kaushal Kumar Karn ( Munni Ji)
  • 28.Hemant Kumar- Mob: 8094013203
  • 29.Madanshyam Lal- Mob: 9471642927
  • 30.Niraj Kumar- Mob: 9308631632
  • 31.Ranjeet Kumar Karn- Mob: 7677684422
  • 32.Hemant Kumar Das- Mob: 8094013203
  • 33.Amar Kumar ( Babu Lal)- Mob: 9934844146/9234788094
  • 34.Guddu Karn- Mob: 8676999523
  • 35.Sunil Kumar- Mob: 8002353561
  • 36.Saumya Saurabh (Minal) – Mob: 7631671248
  • 37.Ritesh Ranjan (Janu)- Mob: 9199704745
  • 38.Somesh Ranjan (Sanu)- Mob: 8088043773
  • 39.Shambhu Kumar Lal- Mob: 9953958760
  • 40.Ashish Kumar Mallik (Rishu)- Mob: 9708449624
  • 41.Amit Kumar Karn (Bittu)- Mob: 9386816335
  • 42.Sujeet Kumar Karn (Pinku)- Mob: 9525166554
  • 43.Kunal Kumar

 

SHREE CHITRAGUPTA

Posted by chitraguptasamitiasi on November 29, 2013 at 12:50 AM Comments comments (0)

"एक दिव्य देव शक्ति जो चिन्तान्त: करण में चित्रित चित्रों को पढ़ती है, उसी के अनुसार उस व्यक्ति के जीवन को नियमित करती है, अच्छे-बुरे कर्मो का फल भोग प्रदान करती है, न्याय करती है। उसी दिव्य देव शक्ति का नाम चित्रगुप्त है।" चित्रगुप्तजी कायस्थों के जनक हैं।


 

चित्रगुप्त जी हमारी-आपकी तरह इस धरती पर किसी नर-नारी के सम्भोग से उत्पन्न नहीं हुए... न किसी नगर निगम में उनका जन्म प्रमाण पत्र है.

कायस्थों से द्वेष रखनेवालों ने एक पौराणिक कथा में उन्हें ब्रम्हा से उत्पन्न बताया... ब्रम्हा पुरुष तत्व है जिससे किसी की उत्पत्ति नहीं हो सकती. नव उत्पत्ति प्रकृति तत्व से होती है.

'चित्र' का निर्माण आकार से होता है. जिसका आकार ही न हो उसका चित्र नहीं बनाया जा सकता... जैसे हवा का चित्र नहीं होता. चित्र गुप्त होना अर्थात चित्र न होना यह दर्शाता है कि यह शक्ति निराकार है.हम निराकार शक्तियों को प्रतीकों से दर्शाते हैं... जैसे ध्वनि को अर्ध वृत्तीय रेखाओं से या हवा का आभास देने के लिये पेड़ों की पत्तियों या अन्य वस्तुओं को हिलता हुआ या एक दिशा में झुका हुआ दिखाते हैं.

कायस्थ परिवारों में आदि काल से चित्रगुप्त पूजन में दूज पर एक कोरा कागज़ लेकर उस पर 'ॐ' अंकितकर पूजने की परंपरा है.'ॐ' परात्पर परम ब्रम्ह का प्रतीक है.सनातन धर्म के अनुसार परात्पर परमब्रम्ह निराकार विराट शक्तिपुंज हैं जिनकी अनुभूति सिद्ध जनों को 'अनहद नाद' (कानों में निरंतर गूंजनेवाली भ्रमर की गुंजार;) केरूप में होती है और वे इसी में लीन रहे आते हैं. यही शक्ति सकल सृष्टि की रचयिता और कण-कण की भाग्य विधाता या कर्म विधान की नियामक है. सृष्टि में कोटि-कोटि ब्रम्हांड हैं. हर ब्रम्हांड का रचयिता ब्रम्हा,पालक विष्णु और नाशक शंकर हैं किन्तु चित्रगुप्त कोटि-कोटि नहीं हैं, वे एकमात्र हैं... वे ही ब्रम्हा, विष्णु, महेश के मूल हैं.आप चाहें तो 'चाइल्ड इज द फादर ऑफ़ मैन' की तर्ज़ पर उन्हें ब्रम्हा का आत्मज कह सकते हैं.

वैदिक काल से कायस्थ जान हर देवी-देवता, हर पंथ और हर उपासना पद्धति का अनुसरण करते रहे हैं चूँकि वे जानते और मानते रहे हैं कि सभी में मूलतः वही परात्पर परमब्रम्ह (चित्रगुप्त;) व्याप्त है.... यहाँ तक कि अल्लाह और ईसा में भी... इसलिए कायस्थों का सभी के साथ पूरा ताल-मेल रहा. कायस्थों ने कभी ब्राम्हणों की तरह इन्हें या अन्य किसी को अस्पर्श्य या विधर्मी मान कर उसका बहिष्कार नहीं किया.

निराकार चित्रगुप्त जी कोई मंदिर, कोई चित्र, कोई प्रतिमा. कोई मूर्ति, कोई प्रतीक, कोई पर्व,कोई जयंती,कोई उपवास, कोई व्रत, कोई चालीसा, कोई स्तुति, कोई आरती, कोई पुराण, कोई वेद हमारे मूल पूर्वजों ने नहीं बनाया चूँकि उनका दृढ़ मत था कि जिस भी रूप में जिस भी देवता की पूजा, आरती, व्रत या अन्य अनुष्ठान होते हैं सब चित्रगुप्त जी के एक विशिष्ट रूप के लिये हैं. उदाहरण खाने में आप हर पदार्थ का स्वाद बताते हैं पर सबमें व्याप्त जल (जिसके बिना कोई व्यंजन नहीं बनता;) का स्वाद अलग से नहीं बताते. यही भाव था... कालांतर में मूर्ति पूजा प्रचालन बढ़ने और विविध पूजा-पाठों, यज्ञों, व्रतों से सामाजिक शक्ति प्रदर्शित की जाने लगी तो कायस्थों ने भी चित्रगुप्त जी का चित्र व मूर्ति गढ़कर जयंती मानना शुरू कर दिया. यह सब विगत ३०० वर्षों के बीच हुआ जबकि कायस्थों का अस्तित्व वैदिक काल से है.

वर्तमान में ब्रम्हा की काया से चित्रगुप्त के प्रगट होने की अवैज्ञानिक, काल्पनिक और भ्रामक कथा के आधार पर यह जयंती मनाई जाती है जबकि चित्रगुप्त जी अनादि, अनंत, अजन्मा, अमरणा, अवर्णनीय हैं...



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